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बदलाव की आवश्यकता


वैसे तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है अर्थात एक ऐसा देश जहाँ धर्म के आधार पर कोई  भेदभाव नहीें होता है,एक ऐसा देश जहाँ पर लोगों को उनके कर्म के अनुसार सम्मान मिलता है ,धर्म के अनुसार नहीं। किन्तु पुराने समय में समाज के कुछ लोगों द्वारा समाज के कुछ वर्गों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था। समाज की उपेक्षा का शिकार बनने के कारण अपने ही समाज के कुछ लोग समय के साथ प्रगति नहीं कर पाए। परिणामस्वरूप उन्हे समाज के पिछडे वर्ग के रूप मे सम्बोधित किया गया। पिछडे वर्ग के पुनर्विकास के उद्देश्य से समाज मे आरक्षण का उदय हुआ।

                           देश में पिछडे वर्ग के लोगों को पिछले कुछ वर्षोें से जो आरक्षण मिल रहा है,उससे उनकी स्थिति  में सामाजिक स्तर पर सुधार हुआ, और पिछडे वर्ग के लोग आज विकसित भी हो गए । किन्तु इस जातीय आरक्षण के कारण पिछडे वर्ग के जो लोग आरक्षण का लाभ उ्ठा आज स्वाबलम्बी बन चुके हैें तथा आर्थिक रूप से विकसित हो चुके हैं उनकी पीढियाँ आजतक इस जातीय आरक्षण का लाभ उठा रहीं हैं । इसके विपरीत वह वर्ग जो वास्तव में आर्थिक रूप से पिछडा है , वे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के बावजूद जीवन के इस इम्तिहान में आरक्षण से हार जाते हैं । समाज में इस प्रकार के भेदभाव को दूर करने के लिए तथा सभी वर्ग के लोगों का समुचित विकास करने के लिए आवश्यक है कि देश में आरक्षण जाति के आधार पर नहीं अपितु गरीबी के आधार पर  दिया जाए ,फिर चाहें वह गरीब पिछडे वर्ग का हो या फिर सामान्य वर्ग का ।
                             -मृणालिनी शर्मा
                    

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राजनीति का गिरता स्तर

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योग्यता महत्वपूर्ण या जाति

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सन्यासी से सत्ता तक

                       आज बात करते हैं ,एक ऐसे सन्यासी कि जो आज राजनीतिक जगत की नई सनसनी बन चुका है।भारत से लेकर पाकिस्तान तक अगर कोई व्यक्ति आज चर्चा का केन्द्र बना हुआ है ,तो वो है उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री 'योगी  आदित्यनाथ' ।                       एक तरफ भगवा वस्त्र ,मस्तक पर तिलक, आंखों में तेज लिए एक साधु तथा दूसरी ओर प्रखर हिंदुत्ववादी ,जनसेवक ,आक्रामक शैली तथा राष्ट्रवादी छवि लिए एक निर्भीक राजनेता । यह सफर है,एक सन्यासी का जो आज भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री है।                        इस सफर की शुरुआत होती है ,उत्तराखंड के कोटद्वार जिले से, जहां की पावन भूमि में 5 जून ,1972 ई0 को 'अजय सिंह बिष्ठ ' का जन्म हुआ ।अजय को बचपन से ही राजनीति में रूचि थी । इन्होंने उत्तराखंड के गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित विषय से बीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। किन्तु शायद अजय के भाग्य में राजनी...

नारी सशक्तिकरण का डिजिटल रूप या पब्लिसिटी स्टंट, आखिर क्या है ‘मीटू’ के पीछे का सच

बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने जाने- माने अभिनेता नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाकर भारत में ‘ मीटू ’ नामक जिस आग को जो हवा दी, उसने बॉलीवुड समेत, मीडिया, राजनीति जगत और बीसीसीआई तक को अपनी चपेट में ले लिया है. नाना पाटेकर के बाद अब तक फिल्म डॉयरेक्टर विकास बहल, राज्यसभा सांसद एम.जे.अकबर, बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी और यहां तक की संस्कारी बाबू आलोकनाथ समेत कई बड़े धुरधंर मीटू के लपेटे में आ चुके हैं.        कई बड़े नामों के मीटू में फंसने के बाद देश भर में इसको लेकर हलचल पैदा हो गयी है. कुछ लोग इसे नारी सशक्तिकरण के डिजिटल रूप की तरह देख रहे हैं तो कुछ इसे महज एक पब्लिसिटी स्टंट मान रहे हैं. जरूरी नहीं है कि मीटू के अंतर्गत लगाए गये सभी आरोप पूरी तरह से सही हों, लेकिन   इसमें कोई दोहराय नहीं है कि इन आरोपों में कुछ हद तक तो सच्चाई है ही, जो कि काम की जगह पर महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार की सच्चाई उजागर कर रहे हैं. यह मुहिम सच सामने लाने का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है या पब्लिसिटी स्टंट ये तो वक्त बतायेगा, फिलहाल हम आपको बताते हैं मीटू की अब तक की...

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नारी सशक्तिकरण पर चर्चा के लिए, एक मंच सजाया गया, जहां पर वहां के माननीय नेता जी, को भी बुलाया गया, बातों और वादों का पिटारा लेकर, नेता जी मंच पर आते हैं, फिर नारी के सम्मान में, दो - चार नई पंक्तियाँ सुनाते हैं, नारी पूजनीय व वन्दनीय है, यह पाठ सभी को पढ़ाते  हैं, फिर नारी को मान और सम्मान दिलाने के, नए- नए वादे करते जाते हैं | नेता की बातों से थक कर, एक महिला श्रोता बोल पड़ी, भावुक होकर सबके समक्ष, जज्बात यूँ अपने खोल पड़ी, नेता जी मैं तो एक राजनीतिक मुद्दा हूँ, जिसे भुना आप चुनाव तो जीत जाओगे, पर कब तक झूठे वादों से, ऐसे हमको बहलाओगे, इन भाषणों और कविताओं से ही, तुम कब तक मान बढ़ाओगे, तारीख बता दो नेता जी, किस दिन सम्मान दिलाओगे ? फिल्मों की प्रेम कहानी तो, सबको पसंद आती है, अपनी बेटी फिर क्यों तुमको, चरित्रहीन नजर आती है, फिल्मों की अदाकाराओं की, आजादी भी बड़ा लुभाती है, अपनी बहुएं फिर क्यों तुमको, घूँघट में ही भाती हैं, आजादी का असली मतलब, कैसे इनको समझाओगे, तारीख बता दो नेता जी, किस दिन सम्मान दिलाओगे ? नारी तुम केवल श्रृद्धा हो, ये ग...

मैं शहीद हो गया हूं

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प्रकृति

तपता है सूरज दिनभर , दुनिया को रोशन करने को। चलती रहती है वायु सदा , जन -जन को शीतल करने को । बहता है बादल भी खुद, धरती को जीवन देने को। स्वार्थी मात्र एक मानव है , जो खड़ा है सब कुछ लेने को । तुमको सब कुछ देती प्रकृति, है शेष नहीं कुछ देने को। इस धरती का सम्मान करो, है जगह स्वर्ग यह रहने को। अब मत इसको बर्बाद करो , इस स्वर्ग को स्वर्ग ही रहने दो।                                  -मृणालिनी शर्मा

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस हद तक?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है अर्थात एक ऐसा देश जहां पर लोगों को अपने अनुसार जीवन जीने और अपने विचार रखने की पूरी स्वतंत्रता है और यह लोकतंत्र मात्र संविधान की किताब तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्रत्येक भारतीय के वास्तविक जीवन में भी अमल करता है । अतः इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर कहा जाए कि दुनिया में अगर कोई देश सच्चे मायनों में लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करता है तो वह भारत ही है।                       भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, अर्थात भारत का प्रत्येक नागरिक अपने विचारों को बोलकर, लिखकर  या किसी अन्य माध्यम से प्रकट करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है । किन्तु इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है  कि आप अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी बयान बाजी या नारेबाजी  करो । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नही है कि आप जिस देश की मिट्टी में पले -बढ़े हो,  उसी भारत माता को बाँटने की बात करो ।                   ...

देशभक्ति आखिर है क्या ?

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